सूरह अदियात (100) हिंदी में | Al-Aadiyaat in Hindi

सूरह अदियात “Al-Aadiyaat”
कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:11 verses
पारा:30

नाम रखने का कारण

पहले ही शब्द “अल-आदियात” (दौड़ने वाले) को इसका नाम दिया गया है।

अवतरणकाल

इसके मक्की और मदनी होने में मतभेद है। हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रजि०), जाबिर, हसन बसरी, इकरिमा और अता कहते हैं कि यह मक्की है।

हज़रत अनस बिन मालिक और कृतादा कहते हैं कि यह मदनी है और हज़रत इब्ने अब्बास के दो कथन उल्लिखित हुए हैं। एक, यह कि यह मक्की है और दूसरा यह कि मदनी है।

लेकिन सूरह की वार्ता और वर्णन-शैली साफ बता रही है कि यह न केवल मक्की है, बल्कि मक्का के भी आरम्भिक काल में अवतरित हुई है।

विषय और वार्ता

इसका उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि मनुष्य परलोक का इन्कार कर के या उससे ग्राफिल हो कर कैसे नैतिक पतन के गढ़े में गिर जाता है, और साथ-साथ लोगों को इस बात से सावधान भी करना है कि परलोक में केवल उनके बाह्यकर्मों ही की नहीं, बल्कि उनके दिलों में छिपे हुए भेदों तक की जाँच-पड़ताल होगी।

इस उद्देश्य के लिए अरब में फैली हुई उस सामान्य अशान्ति को प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिससे सारा देश तंग आ चुका था।

हर तरफ रक्तपात होता था और लूट-मार का बाजार गर्म था। कबीलों पर कबीले छापे मार रहे थे और कोई व्यक्ति भी रात चैन से नहीं व्यतीत कर सकता था, क्योंकि हर समय यह खटका लगा रहता था कि कब कोई शत्रु प्रातः में उसकी बस्ती पर टूट पड़े।

यह एक ऐसी स्थिति थी जिसे अरब के सारे ही लोग जानते थे और इसकी बुराई को महसूस करते थे। यद्यपि ने वाला इस पर विलाप करता था और लूटने वाला इस पर खुश होता था।

लेकिन जब किसी समय लूटने वाले की अपनी शामत आ जाती थी तो उसे भी इसकी अनुभूति हो जाती थी कि यह कैसी बुरी दशा है, जिसमें हम लोग ग्रस्त हैं।

इसी स्थिति की ओर संकेत कर के यह बताया गया है कि मृत्यु के पश्चात् दूसरा जीवन और उसमें ईश्वर के समक्ष उत्तरदायित्व से अनभिज्ञ हो कर मनुष्य अपने प्रभु का कृतघ्न हो गया है।

वह ईश्वर की दी हुई शक्तियों को अत्याचार और लूट तथा विनाश के लिए प्रयोग में ला रहा है। वह धन-दौलत के मोह में अन्धा हो कर हर तरह से उसे प्राप्त करने का प्रयास करता है, चाहे वह कैसा ही गन्दा और घिनौना तरीका हो और उसकी हालत स्वयं इस बात की गवाही दे रही है कि वह अपने प्रभु की दी हुई शक्तियों का अनुचित प्रयोग कर के उसके आगे अकृतज्ञता दिखा रहा है।

उसकी यह नीति कदापि न होती यदि वह उस समय को जानता होता जब कब्रों से जीवित हो कर उठना होगा और जब वे इरादे और प्रयोजन तथा उद्देश्य तक दिलों से निकाल कर सामने रख दिए जाएंगे, जिनकी प्रेरणा से उसने संसार में तरह-तरह के कार्य किए थे। उस समय मानवों के प्रभु को भली-भांति मालूम होगा कि कौन क्या कर के आया है और किसके साथ क्या बरताव किया जाना चाहिए।

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