सूरह काफिरून (109) हिंदी में | Al-Kaafiroon in Hindi

सूरह काफिरून “Al-Kaafiroon”
कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:6 verses
पारा:30

नाम रखने का कारण

पहली ही आयत “कह दो कि ऐ काफ़िरो (अल-काफिरून)” के शब्द ‘अल-काफिरून’ को इस सूरह का नाम दिया गया है। 

अवतरणकाल

हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ि०) आदि कहते हैं कि यह सूरह मक्की है। हज़रत अब्दुल्लाह बिन जुबैर (रजि0) कहते हैं कि यह मदनी है।

लेकिन सामन्यतः सभी टीकाकारों की दृष्टि में यह मक्की सूरह है और इसकी वार्ता स्वयं इसके मक्की होने की पुष्टि कर रही है। मक्का मुअज्ज़मा में एक ऐसा समय गुज़रा है जब नवी (सल्ल0) के इस्लामी आह्वान के विरुद्ध कुरैश के बहुदेववादी समाज में विरोध का तूफान तो उठ चुका था, किन्तु अभी कुरैश के सरदार इस बात से बिल्कुल निराश नहीं हुए थे कि नबी (सल्ल0) को किसी-न-किसी तरह समझौते पर तैयार किया जा सकेगा।

इसलिए समय-समय पर वे आपके पास समझौते के विभिन्न प्रस्ताव ले ले कर आते रहते थे, ताकि आप उसमें से किसी को मान लें और वह झगड़ा समाप्त हो जाए जो आप (सल्ल0) के और उनके बीच पैदा हो चुका था।

विषय और वार्ता

इस पृष्ठभूमि को दृष्टि में रख कर देखा जाए तो मालूम होता है कि यह सूरह धार्मिक उदारता के लिए नहीं उतरी थी, (अर्थात इसलिए नहीं उतरी है कि प्रचलित धर्मों को इस बात का प्रमाण पत्र दे दिया जाए कि वे सब अपनी-अपनी जगह पर सत्य हैं।)

जैसा कि आज-कल के कुछ लोग समझते हैं, बल्कि इसलिए अवतरित हुई थी कि इसकी घोषणा कर दी जाए कि काफिरों के धर्म और उनकी पूजा-पाठ और उनके उपास्यों से हम बिल्कुल बरी और विरक्त हैं।

उनसे हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है और उन्हें बता दिया जाए कि कुछ का धर्म और इस्लाम का धर्म दोनों एक दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। उनके परस्पर मिल जाने का सिरे से कोई प्रश्न ही पैदा नहीं होता।

यह बात यद्यपि आरम्भ में कुरैश के काफिरों को सम्बोधित कर के समझौते के उनके प्रस्ताव के में प्रत्युत्तर में कही गई थी, लेकिन यह उन्हीं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे कुरआन में अंकित कर के समस्त मुसलमानों को कयामत तक के लिए यह शिक्षा दे दी गई है कि कुछ का धर्म जहाँ जिस रूप भी है, उन्हें उससे कथन और कर्म दोनों से असम्बद्धता प्रकट करनी चाहिए।

सूरह काफिरून (109) हिंदी में

अल्लाह के नाम से जो बड़ा ही मेहरबान और रहम करने वाला है।

  • (1) कह दो कि ऐ काफिरो (इन्कार करने वालो) ।
  • (2) मैं उनकी बंदगी (इबादत) नहीं करता जिनकी बन्दगी तुम करते हो।
  • (3) न तुम उसकी बंदगी करने वाले हो जिसकी बंदगी मैं करता हूँ।
  • (4) और न मैं उनकी बन्दगी करने वाला है जिनकी बन्दगी तुम ने की है।
  • (5) और न तुम उसकी बन्दगी करने वाले हो जिसकी बन्दगी मैं करता हूँ।
  • (6) तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म है और मेरे लिए मेरा धर्म।

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