गुनाह करने की चार वजह होती हैं

अमूमन गुनाह करने की चार वुजूहात होती हैं। अल्लाह तआला ने उन तमाम वुजूहात के जवाबात मजीद में इरशाद फ़रमा दिए हैं।

पहली वजह : यह होती है कि आदमी यह समझता है कि मुझे गुनाह करते वक्त कोई नहीं देख रहा है। परवरदिगारे आलम ने उसका जबाब यूँ दिया है कि "तेरा रब तेरी घात में लगा हुआ है।" (सूरह फ़ज आयत 14 ) शिकारी जब शिकार पर अपना निशाना बाँधता है तो थोड़ी देर के लिए बहुत ही ज़्यादा मुतवज्जोह होकर उसकी तरफ़ देखता है। तवज्जोह की इस कैफियत के साथ देखने को 'मिरसाद' कहते हैं। मानो अल्लाह तआला इस कदर गौर से इंसान को देख रहा है।


दूसरी वजह : गुनाह करने की दूसरी वजह यह होती है कि इंसान समझता है कि उसके पास कोई नहीं है। इसके जवाब में फ़रमाया कि जब तुम तीन होते हो तो वह चौथा होता है : यानी वह तुम्हारे साथ होता है तुम जहाँ कहीं भी होते हो।


तीसरी वजह : गुनाह करने की तीसरी वजह यह होती है कि आदमी के दिल में यह एहसास होता है कि मेरी हरकतों का किसी को पता नहीं चला, जबकि अल्लाह तआला फ़रमाते हैं वह जानता है तुम्हारी आँखों की खियानत को और जो तुम्हारे दिल में छुपा हुआ है" (सूरह हदीद, आयत 4)


चौथी वजह : गुनाह करने की चौथी वजह यह होती है कि आदमी यह कहता है कि मैं अगर यह बुराई करता भी हूँ तो कोई मेरा क्या कर लेगा। जी हाँ ! जब इंसान बागी हो जाए और गुनाह पर जुरअत बढ़ जाए तो वह बेशर्म होकर ऐसी बातें कह देता है। अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त उसका भी जवाब देते हैं, फ़रमाया : परवरदिगार की पकड़ बड़ी दर्दनाक और बड़ी शदीद है। यानी "ऐसे बाँधेगा कि तुम्हें ऐसे बाँधेगा की तुम्हें ऐसे कोई दूसरा बाँध नहीं सकता।" और कहा “मैं परवरदिगार वह अज़ाब दूँगा कि जहानों में कोई दूसरा अज़ाब दे नहीं सकता।" 


गुनाह करने की इन वजह का जवाब कुरआन मजीद में देने की वजह यह थी कि इंसान गुनाहों से बच जाए और अपने परवरदिगार का फ़रमाँबरदार बन्दा बन जाए। शैतान की यह कोशिश होती है कि इंसान को गुनाहों में मस्त रखे और रहमान की यह कोशिश होती है कि इंसान जाहिर हो या पोशीदा जो भी गुनाह करता है उसको छोड़ दे। अब बन्दे को चाहिए कि अपने परवरदिगार की आवाज़ पर लब्बैक कहते हुए गुनाहों भरी जिन्दगी को छोड़ दे और नेकियोंवाली जिन्दगी को इख्तियार करे।


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